एशिया में अमेरिकी दबदबे को चुनौती, टैरिफ विवाद पर ट्रंप सरकार में हड़कंप

 

शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भारत, रूस और चीन की सक्रियता ने एशिया में अमेरिकी रणनीति को नई चुनौती दी है। इस मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संयुक्त मौजूदगी को लेकर वॉशिंगटन में गहरी चिंता देखी जा रही है। सूत्रों के अनुसार, अमेरिका की ओर से सम्मेलन में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं रही, जिसे कुछ विश्लेषक “एशिया में अमेरिकी एंट्री पर रोक” के संकेत के तौर पर देख रहे हैं।

उधर, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी भारत को लेकर कई बयान दिए हैं। उन्होंने दावा किया कि भारत ने टैरिफ घटाने का प्रस्ताव दिया है, लेकिन भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंध अभी भी “एकतरफा” हैं। ट्रंप ने यह भी कहा कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के इच्छुक हैं, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठ पाया है।

मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि ट्रंप के प्रयासों के बावजूद हाल में हुई फोन कॉल को भारत की ओर से स्वीकार नहीं किया गया। इस घटना को लेकर अमेरिकी राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस समय अपने बहुपक्षीय संबंधों को प्राथमिकता दे रहा है और इसी कारण अमेरिका के साथ संवाद में सतर्कता बरत रहा है।

व्हाइट हाउस में बीते 72 घंटों से लगातार उच्च स्तरीय बैठकों का दौर जारी है। इन बैठकों का मुख्य एजेंडा भारत और एशिया में अमेरिका की रणनीति को लेकर आगे की दिशा तय करना बताया जा रहा है। इसमें विशेष रूप से व्यापारिक टैरिफ, इंडो-पैसिफिक रणनीति और भारत-रूस संबंधों पर चर्चा हो रही है।

विश्लेषकों का कहना है कि SCO में भारत की बढ़ती भूमिका ने वॉशिंगटन पर दबाव बढ़ा दिया है। भारत ने आतंकवाद के खिलाफ मजबूत रुख और रूस-चीन के साथ साझेदारी के जरिए खुद को एक अहम वैश्विक खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया है। वहीं, अमेरिका को अब यह तय करना होगा कि वह भारत के साथ अपने रिश्तों को किस तरह से नए संतुलन में ढालता है।

भारत और अमेरिका के बीच साझेदारी को भविष्य का निर्णायक रिश्ता बताया गया है, लेकिन हाल की घटनाओं ने दोनों देशों के बीच कुछ असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या वॉशिंगटन और नई दिल्ली अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर सहयोग को नई ऊंचाइयों पर ले जा पाते हैं या एशिया में अमेरिकी प्रभाव सीमित होता चला जाएगा।

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