पहलगाम आतंकी हमले पर बयान को लेकर शशि थरूर ने दी सफाई, कहा– ‘राष्ट्र सर्वोपरि है, आलोचना के बावजूद रुख नहीं बदलूंगा’

 

पहलगाम आतंकी हमले के बाद कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ नेता शशि थरूर के बयानों को लेकर पार्टी के भीतर मचे राजनीतिक घमासान के बीच उन्होंने अपना रुख स्पष्ट किया है। शशि थरूर ने रविवार को कहा कि भले ही उनके रुख की आलोचना हो रही है, लेकिन वह पीछे नहीं हटेंगे क्योंकि उनका मानना है कि “देश पहले आता है, पार्टी बाद में।”

हाल ही में थरूर ने आतंकवाद के खिलाफ केंद्र सरकार और सशस्त्र बलों की कार्रवाई का समर्थन किया था, जिसके बाद कांग्रेस पार्टी के भीतर कुछ नेताओं ने उनके बयान को लेकर नाराजगी जताई थी। अब उन्होंने इस पूरे विवाद पर चुप्पी तोड़ते हुए कहा है कि उनकी निष्ठा पहले राष्ट्र के प्रति है, न कि किसी राजनीतिक दल के प्रति।

‘पार्टी नहीं, देश सर्वोपरि’

थरूर ने कहा, “आपकी पहली निष्ठा किसके प्रति है? मेरे विचार में, राष्ट्र सर्वोपरि है। पार्टियाँ राष्ट्र को बेहतर बनाने का एक माध्यम हैं। इसलिए जिस भी पार्टी से आप हों, उसका उद्देश्य एक बेहतर भारत का निर्माण होना चाहिए।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि देशहित के मुद्दों पर सभी राजनीतिक दलों को एकजुट होना चाहिए।

संसद और बहुदलीय सहयोग पर जोर

शशि थरूर ने भारतीय संसद की विविधता को रेखांकित करते हुए कहा कि वर्तमान में संसद में 46 राजनीतिक दल हैं और ऐसे मुद्दे जरूर होंगे, जहां सभी दल एकमत हो सकते हैं। उन्होंने कहा, “यह आसान नहीं है, लेकिन मैं मानता हूं कि देशहित में एकजुटता जरूरी है।”

कांग्रेस नेता ने कहा, “जो रुख मैंने हाल ही में देश और सीमाओं से जुड़े मामलों में लिया है, उसके कारण बहुत से लोग मेरी कड़ी आलोचना कर रहे हैं। लेकिन मैं अपनी बात पर अड़ा रहूंगा क्योंकि मेरा मानना है कि देश के लिए यही सही है।”

नेहरू का हवाला देकर कांग्रेस पर निशाना?

थरूर ने इस दौरान भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के एक प्रसिद्ध उद्धरण का भी जिक्र किया — “अगर भारत मर गया तो कौन बचेगा?” उन्होंने इसे दोहराते हुए कहा कि भारत को हमेशा पहले आना चाहिए। राजनीतिक हलकों में इसे कांग्रेस नेतृत्व की सोच पर एक सूक्ष्म टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के बीच शशि थरूर का बयान एक अहम संकेत है कि पार्टी लाइन से अलग सोचने वाले नेताओं के भीतर राष्ट्रहित को लेकर स्पष्ट प्राथमिकताएं हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस रुख पर क्या रुख अपनाता है और क्या पार्टी के भीतर वैचारिक बहस और गहराती है।

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