पटना में सोमवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी की “वोटर अधिकार यात्रा” का समापन हो गया। यह यात्रा 17 अगस्त को सासाराम से शुरू हुई थी और 23 जिलों से होकर गुजरते हुए राजधानी पटना पहुंची। दावा किया गया था कि यह यात्रा मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ विपक्ष की एकजुटता और जनसमर्थन का प्रदर्शन होगी। लेकिन समापन कार्यक्रम में अपेक्षित भीड़ और विपक्षी दलों की उपस्थिति नहीं दिखी, जिससे इसकी सफलता पर सवाल खड़े हो गए।
गांधी मैदान से अंबेडकर मूर्ति तक मार्च का ऐलान किया गया था, लेकिन प्रशासन से अनुमति केवल डाकबंगला चौराहे तक ही मिली। इस वजह से यात्रा का समापन वहीं कर दिया गया। कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी को विरोध का भी सामना करना पड़ा। कई जगहों पर उन्हें काले झंडे दिखाए गए और “मोदी मोदी” के नारे लगे।
यात्रा के समापन में किसी बड़े विपक्षी दल के नेता की मौजूदगी नहीं रही। ममता बनर्जी और अन्य क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने दूरी बनाए रखी। इससे विपक्षी एकता के दावों पर सवाल और गहरे हो गए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह यात्रा कांग्रेस के लिए समर्थन जुटाने से ज्यादा, आंतरिक चुनौतियों और संगठनात्मक सीमाओं को उजागर कर गई।
अपने संबोधन में राहुल गांधी ने कहा कि “वोट चोरी” का मुद्दा एटम बम जैसा है और जल्द ही “हाइड्रोजन बम” लाया जाएगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि जनता को वह अब चेहरा नहीं दिखा पाएंगे। हालांकि, इस बयान को लेकर भी कई हलकों में बहस शुरू हो गई है कि राहुल गांधी का इशारा किस ओर था।
17 अगस्त से शुरू हुई इस यात्रा के दौरान कांग्रेस ने दावा किया था कि जनता व्यापक रूप से इसमें शामिल होगी। लेकिन स्थानीय स्तर पर संगठनात्मक सक्रियता और विपक्षी दलों की भागीदारी कमजोर रही। यात्रा का समापन कांग्रेस नेतृत्व के लिए अपेक्षित राजनीतिक संदेश देने में असफल माना जा रहा है।
बिहार की इस यात्रा ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि विपक्षी एकता का दावा फिलहाल मजबूत जमीन पर खड़ा नहीं है। आगे के राजनीतिक घटनाक्रम में यह देखना दिलचस्प होगा कि राहुल गांधी और कांग्रेस इस असफलता से क्या सबक लेते हैं और 2025 के बिहार चुनाव में इसे कैसे साधते हैं।

