बिहार में जनाधार की तलाश में राहुल गांधी, लेकिन बयानबाज़ी बन गई राजनीतिक बोझ

 

राहुल गांधी का एक बार फिर बिहार दौरा यह दिखाता है कि कांग्रेस राज्य में अपनी खोई हुई ज़मीन वापस पाने की कोशिश में जुटी है। पिछले छह महीनों में ये उनका पांचवां दौरा था। इस बार गया और नालंदा पहुंचे राहुल गांधी ने ‘संविधान सुरक्षा सम्मेलन’ के मंच से केंद्र सरकार और नीतीश कुमार पर तीखे हमले किए, लेकिन उनके बयानों से यह भी साफ दिखा कि कांग्रेस नेतृत्व अब खुद अपनी राजनीतिक रणनीति में उलझता जा रहा है।

दलित कार्ड और पुराने नारों की वापसी

राहुल गांधी ने माउंटेन मैन दशरथ मांझी के परिजनों से मुलाकात की और सामाजिक न्याय का एजेंडा दोहराया। राजगीर के इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में आयोजित सम्मेलन में उन्होंने दलितों और अत्यंत पिछड़ा वर्ग को साधने की कोशिश की। लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस ने इस वर्ग को वास्तव में मजबूत किया या सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया?

राहुल गांधी का यह कहना कि “संविधान खतरे में है”, अब पुराना नारा बन चुका है जिसे वे हर चुनाव से पहले दोहराते हैं। इस बार भी उन्होंने इसी लाइन को दोहराया, लेकिन जमीन पर उसका असर कितना होगा, यह स्पष्ट नहीं है।

सीधा हमला पीएम मोदी और नीतीश पर

अपने भाषण में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें “सरेंडर करने की आदत है।” उन्होंने यह भी कहा कि “दो मिनट में चिट्ठी लिखने लगते हैं।” वहीं नीतीश कुमार को घेरते हुए उन्होंने उन्हें “क्राइम कैपिटल ऑफ इंडिया” का मुख्यमंत्री बता दिया और आरोप लगाया कि वे बार-बार पाला बदलते हैं।

बिहार में कांग्रेस को मजबूत करने की राहुल गांधी की मंशा भले स्पष्ट हो, लेकिन उनकी बयानबाज़ी कई बार खुद उनके लिए ही चुनौती बन जाती है। लगातार दौरे और सम्मेलनों के बावजूद यह सवाल बना हुआ है कि क्या कांग्रेस राज्य में ठोस संगठन खड़ा कर पाएगी या फिर सिर्फ नारों और विरोध के सहारे ही मैदान में टिके रहने की कोशिश करेगी।

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