भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता फिर शुरू, तनाव के बीच रिश्तों में बढ़ा मेल

 

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधों में नए मोड़ की शुरुआत हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में भारत से रूसी तेल खरीदने के कारण भारतीय निर्यात पर 50% टैरिफ लगाने के बाद दोनों देशों ने फिर से व्यापार समझौते पर बातचीत की पहल की है। यह कदम द्विपक्षीय रिश्तों में नयापन लाने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, खासकर जब पहले ट्रंप प्रशासन ने भारत पर कड़ी आलोचना की थी।

इस बार की वार्ता का नेतृत्व अमेरिका के ट्रेड सलाहकार पीटर नेवारो कर रहे हैं, जो भारत के प्रति कड़े रुख के लिए जाने जाते हैं। लेकिन हाल ही में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया है। एक CNBC इंटरव्यू में SCO समिट के दौरान नेवारो ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी चीन के साथ खड़े होने में असहज महसूस कर रहे हैं। यह बयान व्यापार वार्ता के पुनरारंभ होने के ठीक बाद आया, जिससे संकेत मिलता है कि अमेरिका ने भारत के साथ अपने रिश्तों को फिर से सुधारने की रणनीति अपनाई है।

कुछ सप्ताह पहले नेवारो ने स्पष्ट किया था कि भारत को अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता में नरमी लानी होगी, अन्यथा इसका नतीजा भारत के लिए अच्छा नहीं होगा। यह बयान दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति को दर्शाता था, लेकिन अब दोनों पक्ष फिर से बातचीत के लिए तैयार हैं।

तीन बड़ी वैश्विक घटनाएं इस समय अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर ध्यान आकर्षित कर रही हैं। एक तरफ रूस ने भारत के साथ अपनी अडिग मित्रता को दोहराया है, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वीकार किया कि रूस-यूक्रेन संघर्ष को मध्यस्थता के जरिए हल करना उनकी अपेक्षा से अधिक कठिन साबित हो रहा है। तीसरी दिशा में, अमेरिका ने भारत के साथ ठप पड़ी ट्रेड बातचीत को फिर से सक्रिय करने का प्रयास शुरू किया है।

विश्लेषकों के अनुसार, यह स्थिति भारत की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में केंद्रीय भूमिका को दर्शाती है। भारत न केवल रूस का एक भरोसेमंद साझेदार बना हुआ है, बल्कि अमेरिका की आर्थिक रणनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। व्यापार वार्ता के पुनः शुरू होने से उम्मीद की जा रही है कि दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।

आगे की प्रक्रिया में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर बातचीत के कई दौर होने की संभावना है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देश किस हद तक अपनी आपसी मतभेद सुलझा पाते हैं और व्यापारिक क्षेत्र में कैसे सहयोग को आगे बढ़ाते हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें इस द्विपक्षीय वार्ता पर टिकी हुई हैं।

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