जातीय जनगणना के फैसले पर कांग्रेस में राहुल बनाम पार्टी के पुराने चेहरे के बीच मचा घमासान

 

1 अक्टूबर 2026 से शुरू होने जा रही जातीय जनगणना को लेकर सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। मोदी सरकार ने इस अहम फैसले की घोषणा करते हुए इसे सामाजिक न्याय और डेटा आधारित नीति निर्माण की दिशा में बड़ा कदम बताया है। लेकिन इस फैसले के बाद कांग्रेस पार्टी में उथल-पुथल मच गई है। राहुल गांधी जहां इसे अपनी पहल का नतीजा बताकर श्रेय लेने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं पार्टी के कई वरिष्ठ नेता इसकी टाइमिंग और नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। इस फैसले ने कांग्रेस के भीतर के जातिगत और वैचारिक मतभेदों को भी उजागर कर दिया है।

जातीय जनगणना की घोषणा दो चरणों में लागू होगी—पहले चरण में 2026 से पहाड़ी राज्यों जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में जनगणना की जाएगी, जबकि दूसरा चरण 2027 से मैदानी इलाकों में शुरू होगा। यह फैसला लंबे समय से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है, लेकिन अब केंद्र सरकार ने इसे आधिकारिक रूप से लागू करने का ऐलान कर दिया है। मोदी सरकार का कहना है कि यह कदम समाज के सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करने और नीतियों को न्यायसंगत बनाने के लिए उठाया गया है।

कांग्रेस की क्रेडिट पॉलिटिक्स और अंदरूनी विरोध

इस घोषणा के साथ ही कांग्रेस ने इसे राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और उनकी लगातार उठाई जा रही मांगों का परिणाम बताते हुए श्रेय लेना शुरू कर दिया। लेकिन सवाल यह है कि जिस पार्टी ने अपने दस वर्षों के शासन में जातीय जनगणना को टालने के लिए कई बार बहाने बनाए, वह अब अचानक इसे अपने एजेंडे की सफलता कैसे बता सकती है? पार्टी के भीतर भी इस पर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। कुछ वरिष्ठ नेता इस मुद्दे को संवेदनशील बताकर इसकी टाइमिंग को राजनीतिक रूप से प्रेरित बता रहे हैं। वहीं, युवा नेतृत्व इसे अपनी जीत के रूप में पेश कर रहा है।

मोदी सरकार का ठोस रोडमैप बनाम कांग्रेस की भ्रमित रणनीति

जहां एक ओर केंद्र सरकार इस फैसले को राष्ट्रहित और सामाजिक समावेश की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं कांग्रेस के पास इसे लेकर कोई स्पष्ट नीति या संदेश नहीं है। राहुल गांधी का दावा उनके ही वरिष्ठों द्वारा चुनौती दिया जा रहा है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस फिलहाल न नीति के स्तर पर स्पष्टता रखती है, न नेतृत्व के स्तर पर एकजुटता। इसके उलट, मोदी सरकार ने न केवल साहसिक निर्णय लिया है, बल्कि आंकड़ों के आधार पर नीति निर्धारण का स्पष्ट रोडमैप भी सामने रखा है।

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