कांग्रेस ने सेना प्रमुख के बयान पर उठाए सवाल, सियासी घमासान तेज

 

भारतीय सेना और वायुसेना प्रमुख के हालिया बयानों को लेकर कांग्रेस ने तीखा हमला बोला है। पार्टी ने सेना प्रमुख की टिप्पणी पर सवाल उठाते हुए इसे गंभीर मुद्दा बताया और आरोप लगाया कि सरकार सैन्य संस्थानों को राजनीतिक विवादों में घसीट रही है। कांग्रेस नेताओं के बयान पर सियासी बवाल मच गया है, जिसके बाद यह मामला संसद से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा का विषय बन गया है।

कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि वायुसेना प्रमुख के हालिया बयान में कई ऐसे बिंदु हैं जो “स्पष्टता और पारदर्शिता” की मांग करते हैं। हालांकि प्रवक्ता ने सीधे तौर पर सेना की भूमिका पर सवाल नहीं उठाया, लेकिन यह आरोप लगाया कि सरकार सैन्य नेतृत्व को अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल कर रही है।

बीते दिनों वायुसेना प्रमुख ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भारत की सामरिक तैयारियों और हालिया अभियानों पर टिप्पणी की थी। उनके बयान में ऑपरेशन और सीमाई सुरक्षा से जुड़ी जानकारी भी शामिल थी, जिसे लेकर विपक्ष का कहना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों को सार्वजनिक मंचों पर राजनीतिक संदर्भ में नहीं लाया जाना चाहिए।

कांग्रेस सांसद के इस बयान पर सत्तारूढ़ दल ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस लगातार सेना का मनोबल गिराने वाले बयान दे रही है। एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा, “जब सेना देश की सुरक्षा में लगी है, तब विपक्ष का इस तरह का व्यवहार सेना के जवानों का अपमान है।”

यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस और सरकार के बीच सैन्य बयानों पर टकराव हुआ हो। इससे पहले भी कई मौकों पर विपक्ष ने रक्षा मामलों पर सरकार की नीति पर सवाल उठाए हैं, जबकि सत्ता पक्ष ने विपक्ष को “राजनीतिक लाभ के लिए सेना को विवाद में घसीटने” का आरोप लगाया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सेना और उसके वरिष्ठ अधिकारियों से जुड़े विवाद राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनने पर न केवल संस्थागत गरिमा प्रभावित होती है, बल्कि इससे सुरक्षा तंत्र की छवि पर भी असर पड़ सकता है।

फिलहाल, कांग्रेस के ताजा बयान के बाद रक्षा मंत्रालय की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है, खासकर जब संसद का सत्र जारी है और विपक्ष-सरकार के बीच टकराव का माहौल पहले से ही गर्म है।

यह मामला न केवल सेना की तटस्थता और गरिमा पर बहस को फिर से जीवित करता है, बल्कि इस पर भी सवाल खड़े करता है कि क्या राजनीति और सेना के बीच की सीमा रेखा और धुंधली होती जा रही है।

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