कांग्रेस की ईरान-इजराइल पर चिंता, विदेश नीति या वोट बैंक की राजनीति?

 

कांग्रेस पार्टी ने हाल ही में ईरान पर इजराइल के हमले को लेकर चिंता जताई है, जिससे देश में एक नई बहस छिड़ गई है। कांग्रेस के इस रुख को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या यह चिंता असली है या फिर मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा। खासतौर से राहुल गांधी की भूमिका को लेकर आलोचना हो रही है, क्योंकि वह बार-बार भारत की विदेश नीति के खिलाफ खड़े नजर आते हैं।

राहुल गांधी के हालिया बयान और रुख से कांग्रेस पार्टी के भीतर भी घमासान मचा हुआ है। पार्टी का रवैया ईरान-इजराइल विवाद पर लगभग वैसा ही नजर आ रहा है जैसा पहले फिलिस्तीन के मुद्दे पर रहा है। इस बीच कांग्रेस नेता प्रियंका वाड्रा ने एक कदम आगे बढ़ते हुए भारत सरकार को “कायर” करार दे दिया है। उन्होंने सरकार द्वारा संयुक्त राष्ट्र के गाजा युद्धविराम प्रस्ताव पर वोटिंग से दूरी बनाए रखने की कड़ी आलोचना की है।

कांग्रेस के तेवर और भारत सरकार पर हमले

प्रियंका वाड्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सवाल उठाया कि क्या भारत अपने ऐतिहासिक रुख और मानवीय मूल्यों से पीछे हट गया है? उन्होंने सरकार की चुप्पी और तटस्थता को “नैतिक कायरता” बताया। कांग्रेस के इन तेवरों को देखते हुए एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि पार्टी बार-बार भारत के रुख के खिलाफ क्यों खड़ी होती है।

विपक्षी नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का यह रुख मुस्लिम वोट बैंक को साधने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। वहीं, जनता में भी यह चर्चा तेज है कि विदेश मामलों पर बार-बार भारत सरकार के खिलाफ बयान देना क्या सही है, खासतौर से तब जब देश की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे हों।

चुनावी नुकसान की चेतावनी

कार्यक्रम के समापन में यह कहा गया कि भारत की सुरक्षा से समझौता करना और विदेशी ताकतों के हाथ मजबूत करना राहुल गांधी की राजनीतिक आदत बन गई है। प्रियंका वाड्रा का संसद में फिलिस्तीन से जुड़ा बैग लेकर आना इस बात का संकेत देता है कि मुस्लिम वोटों के लिए कांग्रेस किसी भी हद तक जा सकती है। अब जब ईरान का मुद्दा उठा है, कांग्रेस फिर से उसी लाइन पर चलती दिख रही है। आने वाले चुनावों में इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ सकता है।

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