भारत के मून मिशन चंद्रयान की कहानी

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24 अगस्त 2023 को भारत के इतिहास में स्वर्णिम शब्दों में लिखा गया है. भारत के भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन(इसरो) के मिशन चंद्रयान-3 ने इतिहास रचते हुए विक्रम लैंडर को चंद्रमा की सफल लैंडिंग कराई है. चंद्रयान की सॉफ्ट लैंडिंग के साथ भारत साउथ पोल पर पहुंचने वाला पहला देश और चांद पर पहुंचने वाला चौथा देश बन गया है.

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चंद्रयान-1 की कहानी

भारत के पहले चांद पर मिशन चंद्रयान-1 को श्रीहरिकोटा से एक PSLV राकेट से 2008 में लॉन्च किया गया था. 1380 किलोग्राम वजनी अंतरिक्ष यान में एक ऑर्बिटर और एक इम्पैक्टर शामिल था. चंद्रयान-1 को 22 अक्टूबर 2008 को भेजा गया था और चंद्रयान-1 सतह से 100 किमी ऊपर केमिकल, मिनेरालोजिकल और फोटो जियोलोजिका मैपिंग के लिए भेजा गया.

भारत के इस यान में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, स्वीडन और बुल्गारिया में बने 11 उपकरण शामिल थे. इसरो का 29 अगस्त 2009 में अंतरिक्ष यान के साथ संपर्क टूट गया. इसरो ने ऑर्बिट को 100 किमी से बढ़ा पर 200 दिया था. श्रीनिवास हेगड़े, चंद्रयान-1 के मिशन निदेशक एक इंटरव्यू में डॉ. के. कस्तूरीरंगन को धन्यवाद देते हुए मिशन की शुरुआत को याद करते हैं. उनका कहना है की डॉ. कस्तूरीरंगन चाहते थे की भारत अंतरिक्ष की दुनिया में सुपरपावर बने.

चंद्रयान-1 ने ढूंढ निकला चांद पर पानी

इसरो के वज्ञानिकों का चंद्रयान-1 से चंद्रमा की सतह पर पानी ढूंढना प्राथमिक उद्देश्य था. विश्व स्तर पर अंतरिक्ष एजेंसियां पानी की उपस्थिति की पुष्टि करने के लिए उत्सुक थीं.  साथ ही चंद्रयान-1 ने मेग्नीशियम, एल्युमीनियम और सिलिकॉन का पता भी लगाया था.

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इसरो के मिनी-एसएआर ने 40 से अधिक ध्रुवीय क्रेटरों से परावर्तित संकेतों के पैटर्न को पानी की बर्फ के अनुरूप पाया. यह एम3 ही था जिसने पुष्टि की कि हमारे चंद्रमा पर हमेशा के लिए पानी मौजूद है और पाया गया कि इसका अधिकांश हिस्सा ध्रुवों पर केंद्रित है.

इसरो के चंद्रयान-1 मिशन की कुल लागत 10 करोड़ से कम था, जो चांद पर जाने वाला सबसे किफायती स्पेस व्हीकल था.

चंद्रयान-2

चंद्रयान-2 इसरो के चंद्रयान-1 के ऑर्बिटर पर आधारित है. चंद्रयान-2 चंद्रमा पर ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर भेजने का एक भारतीय मिशन था. 22 जुलाई 2019 को चांद के कक्षा में लॉन्च किया गया. चंद्रयान-2 के लैंडर ने चंद्रमा के दक्षिणी पोल में उतारने का प्रयास किया लेकिन विफल रहा. ऑर्बिटर ने चंद्रमा का अध्ययन करना जारी रखा.

चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर को सात साल तक चलाने की योजना है. रोवर और लैंडर के चांद के 1 दिन तक जिंदा रहने की उम्मीद थी. भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के संस्थापक विक्रम साराभाई के नाम पर लैंडर का नाम विक्रम रखा गया था. अपनी फिक्स जगह से 410 डिग्री तक झुक गया था. इसलिए विक्रम लैंडर का चंद्रमा पर उतारने से पहले ही संपर्क टूट गया.

लैंडिंग की सतह से सिर्फ 400 मीटर ही दूर था लैंडर. बेहतर उपकरणों का उप्योग करके चंद्रयान-2 ऑर्बिटर का नए डेटा पर निर्माण करने की उम्मीद थी. ऑर्बिटर के काम में चंद्रमा की स्थलाकृति का मानचित्रण करना, सतह के खनिज विज्ञान और मौलिक प्रचुरता की जांच करना, और हाइड्रॉक्सिल और जल बर्फ के हस्ताक्षर की तलाश करना शामिल था. चंद्रयान-2 की कुल लागत 603 करोड़ से कम थी.

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क्या था चंद्रयान-2 का काम?

ऑर्बिटर के अन्दर आधुनिक उपकरण थे. वह थे टेरेन मैपिंग कैमरा (TMC 2)- एक 3D मैप बनाने के लिए चंद्रमा के सतह , चंद्रयान 2 लार्ज एरिया सॉफ्ट x-रे स्पेक्टोमीटर(CLASS)- चंद्रमा के पत्थर में सिलिकॉन, एल्युमीनियम, कैल्शियम जैसे पदार्थ जानने के, ऑर्बिटर हाई रेसोलुसन कैमरा (OHRC)- चांद की फोटो के लिए, सिंथेटिक अपर्चर राडार(SAR)- बर्फ़ पानी के लिए जो की चांद के गड्ढों में.

चंद्रयान-2 की उपलब्धियां

इसरो के पूर्व अध्यक्ष ए एस किरणकुमार ने कहा कि इमेजिंग इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर (IIRS) चंद्रयान-2 पर मौजूद पेलोड में से एक है, जिसे वैश्विक वैज्ञानिक डेटा प्राप्त करने के लिए 100 किमी की ध्रुवीय कक्षा में रखा गया है.

प्लाजियोक्लेज़ (Plagioclase)-समृद्ध चट्टानों में की तुलना में अधिक OH (हाइड्रॉक्सिल) या संभवत H2O (पानी) कण पाए गए हैं, जिनमें उच्च सतह के तापमान पर OH अधिक पाया गया है.

चंद्रयान-2 को मिला चांद पर सोडियम

इसरो के अनुसार चंद्रयान-2 ऑर्बिटर पर एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर ‘CLASS’ ने पहली बार चंद्रमा पर सोडियम के भरमार का मानचित्रण किया है. चंद्रयान-1 ने एक्स-रे में इसकी विशिष्ट रेखा से सोडियम का पता लगाया, जिससे चंद्रमा पर सोडियम की मात्रा को मैप करने की संभावना खुल गई.

इसरो के पूर्व चेयरमैन के सिवन ने बताया कि साल 2019 में चंद्र मिशन के दौरान हुई एक छोटी सी गलती के कारण चंद्रयान-2 मिशन सफल नहीं हो सका.

के सिवन ने मीडिया को संबोधित करते हुए बताया था कि यह घटना चार साल पहले होनी चाहिए थी. सिर्फ चंद्रयान-2 में हुई एक छोटी सी गलती की वजह से हमें सफलता नहीं मिल पाई. अन्यथा, हम ये सभी चीजें चार साल पहले ही हासिल कर सकते थे.

उन्होंने बताया की 2019 में ही उन्होंने चंद्रयान-3 को कॉन्फिगर किया और क्या सुधार करना है, यह भी 2019 में ही तय किया गया.

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मिशन की विफलता के अन्य प्राथमिक कारण हैं:

उतरने के दौरान संचार टूट गया: उतरने के दौरान, लैंडर और ग्राउंड कंट्रोल सेंटर के बीच संचार टूट गया.

ऊंचाई संबंधी अनबन: प्रारंभिक जांच से संकेत मिलता है कि उतरने के दौरान लैंडर ऊंचाई अपेक्षा के अनुरूप नहीं थी.

गर्म वातावरण: चंद्रमा की सतह अत्यधिक तापमान में उतार-चढ़ाव का अनुभव करती है, जिसमें अत्यधिक ठंडी रातों से लेकर चिलचिलाती दिन तक शामिल हैं.

लैंडिंग की जटिलता: चंद्रमा के कम गुरुत्वाकर्षण और वातावरण की कमी के कारण चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग एक अत्यधिक कठिन प्रयास है.

भारत का तीसरा चंद्र मिशन, चंद्रयान-3

भारत के इसरो का चंद्रयान-3 चांद पर तीसरा मिशन है. चांद की सतह पर लंदर और रोवर को उतरना और 1 चांद के दिन तक संचालित करना है. रोवर, जिसका नाम प्रज्ञान है, उसका वजन सिर्फ 26 किलो है. इतिहास रचते हुए चांद के साउथ पोल पर चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर ने बुधवार, 23 अगस्त को शाम 6 बज पर 4 मिनट पर सफत्लापूर्ण लैंड करा. चंद्रयान-3 का लैंडर और रोवर का डिजाईन चंद्रयान-2 से बहुत मिलता-जुलता है.

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चंद्रयान-3 को चंद्रमा की सतह पर, लिफ्टऑफ़ से लेकर टचडाउन तक, स्थापित करने के लिए लगभग 40 दिन लग गए. 14 जुलाई, 2023 को LVM3 राकेट के साथ शुरू हुआ भारत का चांद पर जाने का सपना. LVM3 एक भरी लिफ्ट वहां है जो लगभग 8 मीट्रिक टन को पृथ्वी की कक्षा में रखने में सक्षम है. इसने अन्तरिक्षयान और उसके साथ एक प्रोपल्शन मॉडयूल को चंद्रमा की कक्षा के पास तक ले गया. प्रोपल्शन मॉडयूल ने चंद्रयान-3 को चंद्रमा की कक्षा में करीब 100 किलोमीटर तक ले गया.

भारत दक्षिणी ध्रुव के पास उतारने वाला पहला देश बन चूका है. चंद्रयान-3 के रोवर ने चांद की सतह पर पहला कदम रखा है. विक्रम लैंडर के अंदर 26 किलोग्राम का प्रज्ञान है. (प्रज्ञा ज्ञान की वह अवस्था है जो तर्क और अनुमान से प्राप्त ज्ञान से उच्च है.) लैंडिंग के बाद, विक्रम लैंडर के पैनल को एक रैंप तैनात करने के लिए खोला गया ताकि रोवर प्रज्ञान चांद की सतह पर उतर सके.

इसरो की वेबसाइट के अनुसार, चंद्रयान-3 के तीन मुख्य उद्देश्य हैं. लैंडर को सतह पर उतारना, रोवर का संचालन करना और दक्षिणी ध्रुव पर वैज्ञानिक प्रयोग करना.

लैंडर में शामिल हैं:

  • ChaSTE: सतह पर तापीय चालकता और तापमान को मापने के लिए चंद्रा का सतही थर्मोफिजिकल प्रयोग.
  • ILSA: चांद पर भूकंप का पता लगाने के लिए.
  • Langmuir Probe: चंद्रमा के वातावरण में प्लाज्मा, या अत्यधिक गर्म गैस के और भिन्नता का अनुमान लगाने के लिए.
  • Laser Retroreflector Array: लेज़र रेंजिंग का उपयोग करके दूरियाँ मापने के लिए.
  • APXS: चंद्रमा की मिट्टी और चट्टानों में तत्वों की जांच के लिए.
  • LIBS: चंद्र सतह की रासायनिक और मौलिक संरचना की जांच करने के लिए.inside चंद्रयान-3

 

 

 

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