‘मैं राज्यसभा नहीं जा रहा’: केजरीवाल का बयान और AAP की नई राजनीतिक गणित

लुधियाना पश्चिम विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) की जीत ने जहां पार्टी को एक नई राजनीतिक ऊर्जा दी है, वहीं इसके साथ ही एक अटकल पर भी विराम लग गया है—क्या अरविंद केजरीवाल राज्यसभा जाने वाले हैं? इस सवाल पर खुद केजरीवाल ने स्थिति साफ करते हुए कहा है कि वह राज्यसभा नहीं जा रहे, और यह फैसला पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी लेगी।

क्या था राज्यसभा की अटकलों का आधार?

यह अटकल तब शुरू हुई जब AAP ने अपने राज्यसभा सांसद संजीव अरोड़ा को लुधियाना पश्चिम उपचुनाव का उम्मीदवार बनाया। अगर वह जीतते, तो राज्यसभा की एक सीट खाली होती—और यह संभावना जताई जाने लगी कि अरविंद केजरीवाल खुद उस सीट से उच्च सदन जा सकते हैं, खासकर तब जब दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार झेलनी पड़ी है।

लेकिन नतीजे आने के बाद केजरीवाल ने इन चर्चाओं को नकारते हुए कहा कि वह राज्यसभा नहीं जा रहे। हालांकि, यह जरूर स्पष्ट किया कि पार्टी नेतृत्व तय करेगा कि इस खाली सीट पर किसे भेजा जाएगा।

दिल्ली में हार, पंजाब में फोकस

AAP की यह जीत ऐसे समय आई है जब पार्टी को दिल्ली में बड़ा झटका लगा है। एक समय 70 में से 62 सीटें जीतने वाली पार्टी की संख्या घटकर 22 पर आ गई है, और खुद केजरीवाल सहित कई बड़े नेता अपनी सीटें हार चुके हैं। इस पराजय के बाद AAP के पास सत्ता में बने रहने का एकमात्र रास्ता पंजाब है, जहां उसकी सरकार है और 2027 में चुनाव होने हैं। यही कारण है कि केजरीवाल ने अपना ध्यान पंजाब की राजनीति पर केंद्रित कर रखा है।

इस जीत के साथ पंजाब में पार्टी की स्थिति मजबूत हुई है। राज्यसभा की खाली सीट को लेकर अब यह सिर्फ एक औपचारिकता रह गई है, क्योंकि AAP के पास 117 में से 94 विधायक हैं।

गुजरात से भी अच्छी खबर

लुधियाना के अलावा AAP को गुजरात से भी एक राजनीतिक संबल मिला है। विसावदर सीट पर हुए उपचुनाव में पार्टी के नेता गोपाल इटालिया ने भाजपा उम्मीदवार को मात दी। इस सीट पर भाजपा 2007 से नहीं जीत पाई थी, और AAP की यह वापसी गुजरात में उसके लिए एक प्रतीकात्मक जीत मानी जा रही है।

अब सवाल है कि AAP आगे किसे राज्यसभा भेजेगी? पार्टी अपने विकल्पों को लेकर रणनीति बना रही है। एक तरफ जहां उसे दिल्ली में अपनी खोई राजनीतिक जमीन फिर से हासिल करनी है, वहीं दूसरी ओर पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों में अपनी पकड़ बनाए रखने की चुनौती भी है।

इस जीत ने पार्टी को एक राजनीतिक राहत जरूर दी है, लेकिन 2025 और 2027 के बीच आने वाले चुनावी संघर्षों के लिए यह केवल एक शुरुआत है। पार्टी को अब अपनी रणनीति को पुनः परिभाषित कर के जनता का विश्वास दोबारा जीतने की कोशिश करनी होगी।

 

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