भारत-रूस व्यापार साझेदारी, 2029 तक 100 अरब डॉलर का लक्ष्य, रुपये-रूबल में 90% लेन-देन

 

भारत और रूस ने अगले पाँच वर्षों में अपने वार्षिक व्यापार को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य तय किया है। दोनों देशों ने 2029 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाने का महत्वाकांक्षी रोडमैप तैयार किया है। इस दिशा में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मास्को में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ वार्षिक द्विपक्षीय वार्ता की। बातचीत में परिवहन, रसद सहयोग और व्यापारिक ढाँचों को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया। जयशंकर की यह तीन दिवसीय यात्रा इस वर्ष के अंत में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा का मार्ग प्रशस्त करने के तौर पर देखी जा रही है।

वार्ता के बाद जयशंकर ने कहा कि यह मुलाकात जटिल भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच हो रही है। उन्होंने कहा, “हम सभी परिचित हैं कि आज की स्थिति बेहद अनिश्चित है। ऐसे समय में भरोसेमंद और स्थिर साझेदार का होना आवश्यक है।” भारत और रूस के बीच लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक साझेदारी को नई ऊर्जा देने का संदेश इस बयान से स्पष्ट हुआ।

व्यापारिक दृष्टि से एक बड़ा बदलाव यह है कि अब दोनों देशों के बीच 90 प्रतिशत से अधिक लेन-देन राष्ट्रीय मुद्राओं में हो रहे हैं। रूसी उप-प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव ने जानकारी दी कि रुपये और रूबल में भुगतान व्यवस्था ने अमेरिकी डॉलर और यूरो जैसी पारंपरिक मुद्राओं पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर दिया है। यह पहल दोनों देशों के “गैर-डॉलरीकरण” और वित्तीय संप्रभुता बढ़ाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।

भारत की प्राथमिकताओं की बात करें तो इस साझेदारी से उसे कई स्तरों पर लाभ मिलने की उम्मीद है। ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा और प्रौद्योगिकी तक पहुँच, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में सामरिक स्वायत्तता और बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भू-राजनीतिक लाभ, भारत की प्रमुख आकांक्षाएं हैं। रूस ऊर्जा निर्यात और रक्षा सहयोग का एक बड़ा स्रोत है, जबकि भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए स्थिर आपूर्ति और निवेश अवसर चाहता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत-रूस व्यापार संबंध केवल आर्थिक आयाम तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह व्यापक सामरिक साझेदारी का हिस्सा हैं। आने वाले महीनों में दोनों देशों के बीच ऊर्जा, बुनियादी ढाँचे और तकनीकी क्षेत्रों में नए समझौते सामने आ सकते हैं।

स्पष्ट है कि 100 अरब डॉलर के लक्ष्य की ओर बढ़ना केवल व्यापारिक सफलता नहीं, बल्कि वैश्विक परिदृश्य में भारत-रूस संबंधों की मजबूती का संकेत भी होगा। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा से इस साझेदारी को और गति मिलने की संभावना है।

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