नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी का एक साल पूरा, कानूनी चुनौतियों और सियासी दबावों के बीच भविष्य पर सवाल

 

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (LOP) के रूप में अपना एक साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है। हालांकि इस मौके पर जहां उन्हें बधाइयाँ मिल रही हैं, वहीं उनके भविष्य को लेकर राजनीतिक हलकों में सवाल भी उठ रहे हैं। संसद के आगामी मॉनसून सत्र से पहले ऐसी अटकलें तेज हो गई हैं कि क्या राहुल गांधी इस पद पर बने रह पाएंगे या उन्हें इस्तीफा देना पड़ सकता है।

राहुल गांधी इस समय नेशनल हेराल्ड केस में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच का सामना कर रहे हैं। कानूनी पचड़ों में फंसे राहुल गांधी की सांसदी और नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी दोनों ही खतरे में नजर आ रहे हैं। ईडी की कार्रवाई लगातार उनके खिलाफ तेज हो रही है, जिससे उनके राजनीतिक करियर पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

इस बीच, राहुल गांधी ने महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या के मुद्दे को जोरशोर से उठाया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक रिपोर्ट साझा करते हुए लिखा, “सिर्फ तीन महीनों में महाराष्ट्र में 767 किसानों ने आत्महत्या कर ली। क्या ये सिर्फ एक आंकड़ा है? नहीं। ये 767 उजड़े हुए घर हैं। 767 परिवार जो कभी नहीं संभल पाएंगे। और सरकार? चुप है। बेरुख़ी से देख रही है।”

राहुल गांधी ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि जिनके पास करोड़ों रुपये हैं, उनके लोन मोदी सरकार आसानी से माफ कर देती है। उन्होंने अनिल अंबानी के ₹48,000 करोड़ के एसबीआई फ्रॉड का हवाला देते हुए सिस्टम पर सवाल उठाए और कहा कि यह व्यवस्था किसानों को “चुपचाप लेकिन लगातार मार रही है।”

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राहुल गांधी के बयानों से जहां विपक्ष के भीतर किसानों के मुद्दे को लेकर सक्रियता दिख रही है, वहीं उनकी गंभीरता और नेतृत्व क्षमता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। संसद सत्रों के दौरान उनकी भूमिका पर कई बार सवाल उठ चुके हैं और विपक्ष के कुछ नेता भी उन्हें नेता प्रतिपक्ष के तौर पर प्रभावशाली नहीं मानते।

फिलहाल राहुल गांधी के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया और पार्टी के भीतर उठते सवालों ने उनके राजनीतिक भविष्य को अनिश्चितता में डाल दिया है। आने वाले दिनों में संसद के मॉनसून सत्र और अदालतों की सुनवाई इस स्थिति को और स्पष्ट कर सकते हैं।

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