बांग्लादेश में नई पार्टी ‘एनसीपी’ की चुनावी प्रणाली में बदलाव की मांग, भारत ने जूट-गारमेंट आयात पर लगाई रोक


बांग्लादेश में चुनावी माहौल के बीच छात्रों के एक नए राजनीतिक संगठन ने मौजूदा प्रणाली में बदलाव की मांग करते हुए नई बहस छेड़ दी है। नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. मोहम्मद यूनुस के समर्थन से जुड़े छात्र नेताओं ने ‘नेशनल सिटिजन पार्टी’ (एनसीपी) नाम से एक नई पार्टी का गठन किया है, जो आगामी चुनावों में भाग लेने की तैयारी कर रही है। एनसीपी का प्रमुख एजेंडा है—देश की चुनावी प्रणाली में आनुपातिक प्रतिनिधित्व लागू करना।

एनसीपी का कहना है कि मौजूदा प्रणाली बड़े दलों को ही सत्ता तक पहुंचने का मौका देती है, जबकि अल्पसंख्यक और छोटे समूह हाशिए पर रह जाते हैं। इस मांग को बांग्लादेश की कुछ इस्लामी पार्टियों का भी समर्थन मिला है। हालांकि, मुख्य विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने इसका कड़ा विरोध किया है। बीएनपी प्रवक्ता सलाहुद्दीन अहमद ने बयान जारी कर कहा, “ऐसी मांगें चुनाव में देरी करने या उसे रोकने की साजिश का हिस्सा हो सकती हैं।”

बांग्लादेश की राजनीति पहले ही तनावपूर्ण माहौल से गुजर रही है। इस बीच भारत द्वारा लगाए गए ताजा आयात प्रतिबंध ने आर्थिक मोर्चे पर एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। भारत के विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने एक अधिसूचना में स्पष्ट किया कि अब जूट, बुने हुए कपड़े और धागे जैसे उत्पादों का भारत-बांग्लादेश सीमा पर किसी भी भूमि बंदरगाह से आयात प्रतिबंधित रहेगा। यह आयात केवल न्हावा शेवा समुद्री बंदरगाह के जरिए ही किया जा सकेगा।

इससे पहले मई में भारत ने बांग्लादेश से रेडीमेड गारमेंट और प्रोसेस्ड फूड के आयात पर भी इसी तरह के प्रतिबंध लगाए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि इन फैसलों का असर बांग्लादेश के निर्यात पर पड़ेगा और दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।

इधर, बांग्लादेश सरकार ने अदानी पावर को 384 मिलियन डॉलर का भुगतान कर अपने बकाए का एक बड़ा हिस्सा चुका दिया है। यह भुगतान उस 437 मिलियन डॉलर के दायित्व का हिस्सा है जिसे मार्च के अंत तक पूरा किया जाना था। अदानी पावर की आपूर्ति में आई कटौती के बाद अब मार्च 2025 से पूरी आपूर्ति फिर से शुरू कर दी गई है।

बांग्लादेश में चुनावी प्रणाली को लेकर उठी नई मांगों ने सियासी हलचल बढ़ा दी है, वहीं भारत के साथ व्यापारिक तनाव और विदेशी भुगतान संबंधी चुनौतियां सरकार के सामने बड़ी चुनौती के रूप में उभर रही हैं। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि एनसीपी जैसे नए राजनीतिक प्रयोग किस तरह का जनसमर्थन जुटा पाते हैं और भारत-बांग्लादेश व्यापारिक संबंधों की दिशा क्या होती है।

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