मोदी सरकार के 11 साल में विपक्ष की राजनीति क्यों पस्त हुई?

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में बीजेपी सरकार के 11 साल पूरे हो चुके हैं और तीसरे कार्यकाल का पहला साल भी पूरा हो गया है। इन वर्षों में भारतीय राजनीति की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। जहां कभी कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का बोलबाला था, अब वहां मोदी युग का प्रभुत्व दिखाई देता है। बीजेपी ने केवल सत्ता नहीं संभाली, बल्कि विपक्ष को रणनीतिक, वैचारिक और जन समर्थन के स्तर पर पीछे छोड़ दिया। यह दौर न केवल सरकार की मजबूती का गवाह बना, बल्कि विपक्ष की विफलताओं की भी कहानी कहता है।

दिल्ली से महाराष्ट्र तक विपक्ष का सफाया

दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी का उभार कभी कांग्रेस के विकल्प के रूप में देखा गया था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में केजरीवाल की पार्टी पूरी तरह से हाशिये पर चली गई। केंद्र में सशक्त नीति और स्थिर नेतृत्व के मुकाबले में ‘आप’ का मॉडल दम तोड़ता नजर आया। महाराष्ट्र जैसे राज्य, जहां विपक्ष पहले मजबूत दिखता था, वहां बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में चौंकाने वाले नतीजे दिए। बीजेपी ने न केवल चुनाव जीता, बल्कि विपक्षी गठबंधनों की एकता को भी हिला दिया।

गठबंधन की राजनीति और विपक्ष की रणनीतिक हार

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष ने INDIA नाम से एक नया गठबंधन तैयार किया। उद्देश्य था—मोदी को रोकना। लेकिन यह गठबंधन नीतियों, नेतृत्व और संगठनात्मक ढांचे में कमजोर साबित हुआ। कांग्रेस जैसे पुराने दल अपनी छवि सुधारने में नाकाम रहे, जबकि क्षेत्रीय दलों के बीच तालमेल की कमी साफ दिखी। जम्मू-कश्मीर में गठबंधन ने सीटें तो जीतीं, लेकिन कांग्रेस फिर भी सत्ता से दूर रही। बीजेपी वहीं, पहले से अधिक मजबूत होकर उभरी, खासकर उन राज्यों में, जहां कभी उसे ‘आउटसाइडर’ माना जाता था।

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