देश की सर्वोच्च अदालत में बुधवार को एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ, जब चुनाव आयोग (EC) ने वोटर वेरिफिकेशन प्रक्रिया के तहत सामने आए अहम सबूत पेश किए। इन दस्तावेजों से पता चला कि तीन राज्यों — बिहार, बंगाल और कर्नाटक — में करीब 2.5 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा चुके हैं, जिससे विपक्षी दलों में हड़कंप मच गया है।

सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने चार बड़े सबूत पेश किए, जिनमें आधार सत्यापन, राशन कार्ड मिलान, मृतक प्रमाणन और डुप्लीकेट पहचान शामिल थे। आयोग ने दावा किया कि यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और कानूनी है, और इसका मकसद फर्जी वोटिंग को रोकना और चुनाव प्रणाली में भरोसा बनाए रखना है।

गृह मंत्री अमित शाह की ओर से भी इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने आंतरिक समीक्षा बैठकों में स्पष्ट किया कि देश में निष्पक्ष और साफ-सुथरे चुनाव सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता है। शाह की सक्रियता के बाद इस मुद्दे ने और तूल पकड़ लिया है, जिससे राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ गई है।

वहीं, विपक्षी दलों — खासकर कांग्रेस, टीएमसी और जेडी(यू) — ने इस प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट कर कहा, “यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। गरीब और अल्पसंख्यक समुदायों को सुनियोजित तरीके से वोटिंग अधिकार से वंचित किया जा रहा है।”

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी बयान जारी कर कहा कि चुनाव आयोग को केंद्र सरकार के दबाव में नहीं आना चाहिए और हर नागरिक के वोटिंग अधिकार की रक्षा करनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख 28 जुलाई तय की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब तक अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक कोई अंतिम ड्राफ्ट सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।

यह मुद्दा अब केवल तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है। आगे की सुनवाई में यह साफ होगा कि क्या वाकई वोटर वेरिफिकेशन प्रक्रिया निष्पक्ष थी या फिर इसमें किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाया गया।

आगामी लोकसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची की शुद्धता और निष्पक्षता पर यह बहस देश की राजनीति को नई दिशा दे सकती है। कोर्ट के फैसले और चुनाव आयोग की अगली कार्रवाई पर अब सबकी निगाहें टिकी हैं।