हर दिन ऐसा लगता है जैसे कांग्रेस और राहुल गांधी मोदी सरकार के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर कोई न कोई सवाल उठाए बिना नहीं रह सकते। कभी सरकार पर निशाना साधते हैं, तो कभी सेना की कार्रवाई पर संदेह जताते हैं। राहुल गांधी ने हाल ही में पीएम मोदी पर आरोप लगाते हुए कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद किया गया सीजफायर एक तरह का ‘सरेंडर’ है। उन्होंने इंदिरा गांधी का उदाहरण देकर यह भी कहा कि तब सरकार झुकी नहीं थी, आज की सरकार थोड़े से दबाव में घुटने टेक देती है। लेकिन सवाल यह है कि बार-बार ऐसे बयान देकर राहुल गांधी आखिर किसे मजबूत कर रहे हैं — भारत को या उसके दुश्मनों को?
सेना पर संदेह, सरकार पर निशाना
राहुल गांधी की यह परंपरा नई नहीं है। इससे पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और LOC पर जवाबी कार्रवाई पर कांग्रेस ने सबूत मांगे। 2016 में उरी हमले के बाद सेना की सर्जिकल स्ट्राइक हो या 2019 में पुलवामा हमले के बाद एयर स्ट्राइक — हर बार कांग्रेस नेताओं ने सवाल उठाए कि कितने आतंकी मारे गए, कहां मारे गए, क्या वीडियो है? इन सवालों ने न केवल सेना के पराक्रम को कटघरे में खड़ा किया, बल्कि दुश्मन के नैरेटिव को भी बल दिया।
जब बालाकोट स्ट्राइक के बाद विंग कमांडर अभिनंदन की सुरक्षित वापसी हुई, तब भी विपक्ष ने बिना सोचे-समझे सवाल उठाए कि कहीं कोई सौदा तो नहीं हुआ? यह सोचकर हैरानी होती है कि जब सेना दुश्मन के क्षेत्र में घुसकर हमला करती है, तो विपक्ष की ओर से तर्क नहीं, बल्कि अविश्वास सामने आता है।
राष्ट्रवाद बनाम राजनीतिक एजेंडा
मोदी सरकार पर यह आरोप भी लगाया जाता है कि वह सेना की बहादुरी का चुनावी इस्तेमाल करती है। लेकिन जब कांग्रेस इस पर सवाल उठाती है, तो असल में वह सेना की कार्रवाई को ही संदिग्ध बना देती है। यह चिंता का विषय है कि जब कोई विपक्षी नेता यह कहता है कि ऑपरेशन सिंदूर का वीडियो क्यों दिखाया गया, तो वह इस बात को नज़रअंदाज़ करता है कि शायद ये कदम सेना की कार्यवाही पर उठने वाले इन्हीं बेमानी सवालों का जवाब देने के लिए उठाया गया हो।
आज जब भारतीय सेना सीमाओं पर आतंक को मुंहतोड़ जवाब दे रही है, तब सवाल यह है कि क्या सियासी दलों को अपने बयानों से सेना का मनोबल गिराने का हक है? देश की सुरक्षा, उसकी रणनीति और उसका पराक्रम क्या बार-बार प्रेस कॉन्फ्रेंस का विषय बनेगा?