रैली के मुख्य मंच से इमारत-ए-शरिया के अमीर-ए-शरीयत मौलाना अहमद वली फैसल रहमानी और कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद सहित कई धार्मिक और राजनीतिक नेताओं ने संबोधन किया। सलमान खुर्शीद ने कहा, “वक्फ संशोधन कानून को लेकर हमारा विरोध पूरी तरह से जायज है। यह न सिर्फ धार्मिक संपत्तियों पर हमला है, बल्कि संविधान के अनुच्छेदों के भी खिलाफ है।”
मौलाना रहमानी ने अपने संबोधन में कहा कि वक्फ संपत्तियां मुसलमानों की धार्मिक और सामाजिक विरासत हैं और इन पर सरकारी दखल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह कानून अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन है।
रैली में आए प्रदर्शनकारियों ने ‘वक्फ बचाओ’, ‘संविधान बचाओ’, ‘मोदी सरकार मुर्दाबाद’ और ‘नीतीश सरकार होश में आओ’ जैसे नारे लगाए। आयोजकों ने दावा किया कि यह आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा और इसका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय की आवाज को लोकतांत्रिक तरीके से सरकार तक पहुंचाना है।
विपक्षी दलों—कांग्रेस, राजद और वाम दलों—ने इस रैली को खुला समर्थन दिया। राजद प्रवक्ता मनोज झा ने कहा कि वक्फ बोर्ड की संपत्तियां मुसलमानों की पहचान से जुड़ी हैं और इसे किसी भी कीमत पर खत्म नहीं होने दिया जाएगा।
क्या है विवादित वक्फ संशोधन कानून?
केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित वक्फ संशोधन विधेयक में कुछ प्रावधानों को लेकर मुस्लिम संगठनों का कहना है कि इससे वक्फ बोर्ड की स्वतंत्रता प्रभावित होगी और सरकार को वक्फ संपत्तियों में मनमानी करने का अधिकार मिल जाएगा। इसे मुस्लिम समाज की संस्थागत संरचना पर हमला बताया जा रहा है।
आयोजकों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने संशोधन को वापस नहीं लिया, तो देशभर में बड़े आंदोलन किए जाएंगे। इमारत-ए-शरिया ने कहा है कि यह सिर्फ शुरुआत है, और मुस्लिम समाज अपने धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट रहेगा।