कांग्रेस की विदेश नीति पर राजनीति, संयुक्त राष्ट्र में भारत के रुख को लेकर उठाए सवाल

 

जब देश वैश्विक मंच पर संतुलन और समझदारी से कदम उठाता है, तब कांग्रेस पार्टी को यह मौका मिल जाता है कि वह उस पर सस्ती राजनीति करे। दरअसल, कांग्रेस ने गाजा में संघर्ष विराम के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव पर मतदान से दूर रहने के लिए मोदी सरकार पर हमला बोला है। पार्टी ने आरोप लगाया कि भारत की विदेश नीति खस्ताहाल हो चुकी है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से लेकर प्रियंका गांधी, पवन खेड़ा और केसी वेणुगोपाल जैसे वरिष्ठ नेता इस फैसले को “नैतिक कूटनीति के खिलाफ” बता रहे हैं। लेकिन अगर कांग्रेस के बयानों को गौर से सुना जाए तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे भारत की सरकार नहीं, बल्कि इज़रायल के विरोधी गुट की भाषा बोल रहे हों। दुर्भाग्य की बात यह है कि यह कोई पहली बार नहीं हुआ है।

असल में कांग्रेस का इशारा नैतिकता की ओर नहीं, बल्कि विशेष समुदाय की ओर होता है। यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है जिसे बार-बार दोहराया जाता है, ताकि समुदाय विशेष को यह विश्वास दिलाया जा सके कि कांग्रेस ही उनकी सच्ची हिमायती है।

राष्ट्र संकट में, राहुल गांधी फिर से ‘लापता’

दूसरी तरफ जब इज़रायल और ईरान के बीच जबरदस्त संघर्ष जारी है, जब अहमदाबाद में हुआ विमान हादसा अभी ताजा ही है, उस समय भी कांग्रेस नेता राहुल गांधी देश में मौजूद नहीं हैं। खबरों के मुताबिक, राहुल गांधी इस संकटपूर्ण समय में विदेश यात्रा पर हैं। और समय भी ऐसा है—उनका जन्मदिन है।

तो सवाल यह है कि ऐसे महत्वपूर्ण मौके पर जब देश में विदेश नीति पर बहस छिड़ी हुई है, जब सीमा पर तनाव है, जब देश को एकजुट नेतृत्व की ज़रूरत है, तब राहुल गांधी हर बार की तरह इस बार भी नदारद क्यों हैं?

भारत का निर्णय संतुलन, रणनीतिक समझ और अपने दीर्घकालिक हितों की रक्षा को ध्यान में रखकर लिया गया है। लेकिन कांग्रेस को इससे कोई मतलब नहीं—उसे बस एक मौका चाहिए सरकार को घेरने का, चाहे वह राष्ट्रीय हित ही क्यों न हो।

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