सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को उस समय हाईवोल्टेज ड्रामा देखने को मिला जब कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक जनहित याचिका में फंसाने की कोशिश की गई। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के वकील कपिल सिब्बल और प्रशांत भूषण को कड़ी फटकार लगाते हुए फर्जी दस्तावेज पेश करने पर गंभीर चिंता जताई।
यह मामला एक याचिका से जुड़ा था जिसमें प्रधानमंत्री मोदी की कथित भूमिका पर सवाल उठाए गए थे। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि याचिका में जिन दस्तावेजों के आधार पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, वे प्रमाणिक नहीं हैं और संदिग्ध स्रोतों से आए हैं। इस पर बेंच के वरिष्ठ न्यायाधीश ने नाराज़गी जाहिर करते हुए कहा, “आप अदालत की प्रतिष्ठा को फर्जी कागज़ातों से क्यों ठेस पहुंचा रहे हैं?”
जज ने सीधे तौर पर वकील कपिल सिब्बल और प्रशांत भूषण से सवाल किए और कहा कि अदालत को गुमराह करने की कोशिश एक गंभीर अपराध है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि “यदि कोई भी व्यक्ति अदालत में फर्जी दस्तावेज लेकर आएगा, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। यह कोर्ट कोई राजनीति का मंच नहीं है।”
इस घटनाक्रम के बाद कोर्ट ने संबंधित याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर जुर्माना भी लगाने की बात कही। साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह निर्देश भी दिया कि इस तरह के मामलों में जांच एजेंसियां तथ्यों की गंभीरता से जांच करें, ताकि देश के संवैधानिक पदों की गरिमा बनी रहे।
भाजपा नेताओं ने इसे “एंटी-इंडिया गैंग” के खिलाफ न्यायपालिका की सख्ती बताया है। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने सोशल मीडिया पर लिखा, “देश के खिलाफ साजिश रचने वालों को अब कोर्ट में जवाब देना होगा। यह नई न्यायिक चेतना का संकेत है।”
इस प्रकरण ने एक बार फिर अदालतों में जनहित याचिकाओं के नाम पर की जा रही राजनीति को बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी कर सकता है।