प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में चल रहे ‘मिशन आउटरीच’ का असर सदन में भी देखने को मिला। आमतौर पर केंद्र सरकार की आलोचना करने वाले विपक्षी सांसदों—असदुद्दीन ओवैसी और सुप्रिया सुले—ने भी ऑपरेशन सिंदूर को सफल बताया और प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की तारीफ की। इसी तरह, बीजू जनता दल (BJD) भी राज्यसभा में सरकार के समर्थन में खड़ी नजर आई।
इस बहस के दौरान कांग्रेस पार्टी भीतरू मतभेदों और रणनीतिक भ्रम का शिकार होती दिखी। राहुल गांधी का भाषण सदन में उम्मीद के अनुरूप प्रभावी नहीं रहा और उन्हें सोशल मीडिया पर आलोचना का सामना करना पड़ा। प्रियंका गांधी वाड्रा, मल्लिकार्जुन खड़गे और गौरव गोगोई जैसे वरिष्ठ नेताओं के बयान भी कांग्रेस की स्थिति को मजबूती नहीं दे सके। इसके अलावा, कांग्रेस द्वारा शशि थरूर और मनीष तिवारी जैसे अनुभवी नेताओं को बहस की सूची से बाहर रखने का फैसला भी चर्चा में रहा।
इस बीच, एक पुरानी ऐतिहासिक चिट्ठी भी चर्चा का विषय बनी रही। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को लिखे गए पत्र की सामग्री सामने आने के बाद कांग्रेस को और असहज स्थिति का सामना करना पड़ा।
संसद में हुई यह बहस दर्शाती है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ केवल एक सैन्य सफलता नहीं, बल्कि सरकार की कूटनीतिक और रणनीतिक पहल का भी प्रमाण है। जहां एक ओर सरकार ने स्पष्ट जवाबों और तथ्यों के साथ अपना पक्ष रखा, वहीं विपक्ष में एकता और दिशा की कमी नजर आई।
इस विषय पर चर्चा आगे भी जारी रहने की संभावना है, खासकर तब जब ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े और पहलुओं पर सरकार विस्तृत जानकारी साझा कर सकती है।