पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर का अमेरिकी दौरा तब हो रहा है जब उनका देश अंदरूनी संघर्षों से बुरी तरह जूझ रहा है। जहां एक ओर वे 14 जून को अमेरिका में आयोजित अमेरिकी सेना की 250वीं वर्षगांठ में शिरकत करने वाले हैं, वहीं दूसरी ओर बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना पर लगातार हमले हो रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जनरल मुनीर को पहले अपने ही घर की आग बुझानी चाहिए थी? बलूच विद्रोहियों के साथ झड़पों में अब तक पाकिस्तान के 23 जवान मारे जा चुके हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि अब पाकिस्तान के लिए यह सिर्फ आतंरिक सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय साख का भी सवाल बन गया है।

बलूचिस्तान में पाक सेना की बुरी हार

बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना और विद्रोहियों के बीच तनाव तेजी से बढ़ता जा रहा है। हाल के दिनों में विद्रोहियों ने कई सैन्य चौकियों पर हमला कर दिया है और सेना को पीछे हटने पर मजबूर किया है। पाकिस्तान ने भारी संख्या में सैनिकों को वहां भेजा, लेकिन इसके बावजूद बलूच लड़ाके लगातार हावी हैं। बताया जा रहा है कि अलग-अलग झड़पों में सेना को अब तक 23 जवानों की जान से हाथ धोना पड़ा है, जबकि कई सैनिक घायल भी हुए हैं। इसके बावजूद सरकार की तरफ से कोई ठोस रणनीति या समाधान सामने नहीं आया है।

अमेरिका दौरे का विरोध और बढ़ते सवाल

जनरल असीम मुनीर का यह दौरा रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है, लेकिन इसकी टाइमिंग पर सवाल उठ रहे हैं। इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ने मुनीर के दौरे के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है। सवाल उठता है कि क्या एक ऐसे वक्त में, जब देश के अंदर अशांति और सैन्य असफलता सामने है, सेना प्रमुख का विदेश दौरा जायज है? क्या इससे पाकिस्तान की छवि और ज्यादा धूमिल नहीं हो रही?

बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा, आंतरिक विद्रोह और सेना की असफलता ने पाकिस्तान को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है जहां उसकी सैन्य, राजनीतिक और राजनयिक नीतियों की पोल खुलती नजर आ रही है। ऐसे में जनरल मुनीर की वॉशिंगटन यात्रा का प्रभाव कितना सकारात्मक होगा, यह देखना बाकी है।