बलूचिस्तान से उठी चिंगारी अब पूरे पाकिस्तान को झुलसाने लगी है। दशकों से जिस ज़ुल्म और अनदेखी को बलूच जनता झेल रही थी, अब वही पाकिस्तान की फौज पर भारी पड़ रही है। बलूच लड़ाकों ने हाल ही में 23 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया और कई इलाकों में पाकिस्तानी कब्जे को चुनौती दी है। पाकिस्तान की सेना टैंकों और हेलीकॉप्टरों के साथ जवाब देने की कोशिश कर रही है, लेकिन बलूचिस्तान अब सिर्फ हथियारों की लड़ाई नहीं लड़ रहा—ये अब हुकूमत की जड़ों को हिलाने वाला आंदोलन बन चुका है। खबर है कि बलूच लिबरेशन आर्मी का अगला निशाना खुद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ हैं।

बलूचिस्तान, पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है जो देश के कुल क्षेत्रफल का 44% हिस्सा कवर करता है। खनिज संपदा से भरपूर इस इलाके की आबादी महज डेढ़ करोड़ है, लेकिन यहां की जनता अब भी बुनियादी ज़रूरतों से जूझ रही है। यहां के लोगों की नाराज़गी कोई नई बात नहीं है। पाकिस्तान में जबरन शामिल किए जाने के बाद से ही बलूचिस्तान पांच बड़े विद्रोह झेल चुका है। 2005 से चला आ रहा मौजूदा विद्रोह अब चरम पर है और बलूच लड़ाके खुलेआम पाकिस्तान को चुनौती दे रहे हैं।

इतिहास से धोखे तक की दास्तान

1876 में कलात रियासत और ब्रिटिश हुकूमत के बीच हुए समझौते से बलूचिस्तान की राजनीतिक पहचान शुरू हुई। 1947 में जब आज़ादी की लहर चली, तो मीर अहमद खान ने जिन्ना को अपना प्रतिनिधि बनाकर बलूचिस्तान की आज़ादी की वकालत की। शुरुआत में जिन्ना ने समर्थन जताया लेकिन बाद में बलूचिस्तान को पाकिस्तान में मिलाने का दबाव डाला। सेना ने बलपूर्वक इस इलाके पर कब्जा कर लिया और बलूचों के भीतर पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा भरता गया।

बलूच विद्रोह से पीओके तक

1948 में पहला विद्रोह शुरू हुआ, जिसे भले ही कुचल दिया गया, लेकिन आंदोलन थमा नहीं। रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले 15 सालों में 5,000 से ज़्यादा बलूचों को पाकिस्तान ने गायब कर दिया। अब यह विद्रोह सिर्फ बलूचिस्तान तक सीमित नहीं रहा—गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे पीओके क्षेत्र में भी बगावत तेज़ हो रही है। यहां के संगठन “बलवारिस्तान” नाम से एक स्वतंत्र राष्ट्र की मांग कर रहे हैं। जनता की नज़र में पाकिस्तान अब एक ज़ुल्मी ताकत है, जिसके खिलाफ बगावत ज़रूरी हो चुकी है।